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11वीं सदी के वो राजा जिन्होंने विदेशी आक्रमणकारियों को रोका – महाराजा सुहेलदेव राजभर

महाराजा सुहेलदेव राजभर
Maharaja Suheldev Rajbhar
पूरा नाम महाराजा सुहेलदेव राजभर
काल 11वीं शताब्दी
जन्म 1009 ई. बसंत पंचमी के दिन
क्षेत्र श्रावस्ती–बहराइच
वंश राजभर वंश
प्रसिद्धि सैयद सालार मसूद पर विजय
उल्लेख लोककथाएँ, गजेटियर, फारसी इतिहास ग्रंथ


परिचय

महाराजा सुहेलदेव राजभर 11वीं शताब्दी के उत्तर भारत में श्रावस्ती–बहराइच क्षेत्र के एक प्रमुख स्थानीय शासक माने जाते हैं। ऐतिहासिक गजेटियर, औपनिवेशिक अध्ययन, फारसी इतिहास ग्रंथों तथा लोक परंपराओं में उनका उल्लेख भर (राजभर-थारू) समुदाय के एक शक्तिशाली राजा या सरदार के रूप में मिलता है (Nevill 1921; Ellis 1854; Census of India 1891)।


उन्हें Suhal Deo, Sahal Deo Bhar, Suheldev, तथा Suhriddhwaja जैसे विभिन्न नामों से संदर्भित किया गया है (Gazetteer of Oudh 1878; Pandey 1988)। उनका नाम विशेष रूप से 1034 ई. में बहराइच के निकट सैयद सालार मसूद गाजी की मृत्यु से जुड़ा हुआ है (Blunt 1969; Census of India 1891)।


ऐतिहासिक स्रोतों में उल्लेख

औपनिवेशिक एवं प्रशासनिक अभिलेख

Major R. R. W. Ellis द्वारा संकलित Legendary Chronicles of the Buildings of Ancient India (1854) में “Bhars read as Raj Bhars” का स्पष्ट उल्लेख मिलता है, जिससे भर और राजभर शब्दों की ऐतिहासिक समानता सिद्ध होती है (Ellis 1854:97)।


उत्तर प्रदेश जिला गजेटियर, बहराइच (1988) तथा H. R. Nevill द्वारा संपादित Gazetteer of the United Provinces of Agra and Oudh (1921) में चरदा (Charda) के टीले को भर सरदार सुहेल देव / सुहृध्वज का किला बताया गया है (Nevill 1921:116; Pandey 1988:17)।


भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट (Führer 1891) के अनुसार बहराइच क्षेत्र प्राचीन काल में भरों के अधिकार क्षेत्र में था।


बहराइच और भर समुदाय

गजेटियरों के अनुसार बहराइच क्षेत्र में इमारतों, टीलों और कुओं के अनेक अवशेष भर समुदाय से जुड़े हुए हैं, और यह भी सुझाव दिया गया है कि “बहराइच” नाम की उत्पत्ति इसी जनजाति से संबंधित हो सकती है (Nevill 1921:116; Führer 1891)।

चरदा का टीला विशेष रूप से भर सरदार Suhal Deo / Suhriddhwaja of Gonda का दुर्ग माना जाता है (Pandey 1988:17)।


सैयद सालार मसूद गाजी के साथ युद्ध (1034 ई.)

फारसी ग्रंथ मिरात-ए-मसूदी तथा अन्य इस्लामी ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, सैयद सालार मसूद 1033–1034 ई. में बहराइच पहुँचे, जहाँ वे भर शासकों से संघर्ष में मारे गए (Mirat-e-Masudi:125; Rizvi:14)।

Census of India, 1891 में स्पष्ट रूप से दर्ज है कि सैयद सालार मसूद गाजी को 1034 ई. में बहराइच के पास उस समय पराजित कर मार दिया गया, जब वे गोंडा के एक भर/थारू/राजपूत राजा सुहेलदेव के विरुद्ध अभियान का नेतृत्व कर रहे थे (Census of India 1891:217)।

E. A. H. Blunt लिखते हैं कि गाजी मियां संत नहीं थे, बल्कि एक शहीद थे, क्योंकि वे युद्ध में एक भर सरदार सुहेल देव के हाथों मारे गए (Blunt 1969:291)।

Gazetteer of Oudh (1878) में भी यह उल्लेख है कि मसूद राजभरों के हाथों मारा गया (Gazetteer of Oudh 1878:52)।


लोक-सांस्कृतिक एवं नृवंशशास्त्रीय परंपराएँ

फ्रांसीसी और भारतीय नृवंशशास्त्रीय अध्ययनों में Sahal Deo Bhar को गाजी मियां चक्र (Ghazi Miyan Cycle) में एक हिंदू राजा के रूप में वर्णित किया गया है, जिसने गाजी मियां पर आक्रमण किया (Waseem 2003:241–242; Chalier-Visuvalingam 1998:180)।

Islam and the Modern Age तथा Perspectives on Violence and Othering in India जैसे ग्रंथों में भी बहराइच पर हुए संघर्ष में Sahal Deo Bhar की भूमिका का उल्लेख मिलता है (Islam and the Modern Age:42, 58; Tripathi & Singh 2016:6)।


जातीय पहचान पर ऐतिहासिक दृष्टिकोण


विभिन्न स्रोतों में महाराजा सुहेलदेव की जातीय पहचान अलग-अलग रूपों में दी गई है:

भर / राजभर – गजेटियर, ASI, Ellis, अमृतलाल नागर (Ellis 1854; Nevill 1921; Nagar 1970, 1988)

भर-थारू – Mirat-e-Masudi, Census of India 1891

राजपूत (स्थानीय क्षत्रिय) – औपनिवेशिक लेखन एवं आधुनिक पाठ्यपुस्तकें

उत्तर प्रदेश (कक्षा 6) और हरियाणा बोर्ड (कक्षा 7) की पाठ्यपुस्तकों में उन्हें राजभर/भर राजा कहा गया है (UP Textbook; HBSE Textbook)।


विरासत और आधुनिक मान्यता

महाराजा सुहेलदेव के नाम पर राजनीतिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना हुई है, जिनमें सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (2002), सुहेलदेव सुपरफास्ट एक्सप्रेस, 2018 में जारी डाक टिकट, तथा महाराजा सुहेलदेव चिकित्सा महाविद्यालय एवं स्मारक (2021) शामिल हैं (Government of Uttar Pradesh 1999; Government of India 2018, 2021)।


ऐतिहासिक महत्व

आधुनिक इतिहासलेखन में महाराजा सुहेलदेव राजभर को एक अर्ध-पौराणिक लेकिन ऐतिहासिक आधार वाले क्षेत्रीय शासक के रूप में देखा जाता है, जो उत्तर भारत में स्थानीय प्रतिरोध और भर/राजभर समुदाय की ऐतिहासिक चेतना के प्रतीक हैं।


Scholarly Debate / Academic Discussion

नीचे वही कंटेंट है जो Wikipedia के “Talk:” पेज पर डाला जाता है।

इसका उद्देश्य यह दिखाना होता है कि विषय पर विद्वानों में क्या-क्या मत हैं और लेख Neutral Point of View (NPOV) क्यों सही है।

Maharaja Suheldev Rajbhar – Scholarly Debate

Consensus among historians

अधिकांश इतिहासकार इस बात पर सहमत हैं कि महाराजा सुहेलदेव 11वीं शताब्दी के प्रारंभ में पूर्वी उत्तर प्रदेश (श्रावस्ती–बहराइच क्षेत्र) के एक क्षेत्रीय शासक थे। औपनिवेशिक गजेटियर, जनगणना रिपोर्ट (1891), भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण तथा नृवंशशास्त्रीय अध्ययनों में उन्हें भर/राजभर समुदाय के एक शक्तिशाली सरदार या राजा के रूप में वर्णित किया गया है।

Debate on historicity

कुछ संपादकों का मत है कि सुहेलदेव “अर्ध-पौराणिक” हैं क्योंकि उनके नाम से कोई समकालीन अभिलेख या शिलालेख उपलब्ध नहीं है।

इसके विपरीत, अन्य विद्वान तर्क देते हैं कि Ellis (1854), Nevill (1921), Gazetteer of Oudh (1878) और Census of India (1891) जैसे स्वतंत्र प्रशासनिक स्रोतों में उनका उल्लेख होना, एक ठोस ऐतिहासिक आधार की ओर संकेत करता है।


Debate on identity (Caste / Community)

स्रोतों में सुहेलदेव की पहचान अलग-अलग रूपों में मिलती है—

Bhar / Rajbhar

Bhar-Tharu

स्थानीय Rajput (क्षेत्रीय क्षत्रिय)

Wikipedia नीति के अनुसार, लेख में किसी एक पहचान को अंतिम सत्य के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय, सभी प्रमुख विद्वतापूर्ण मतों को उचित संदर्भों के साथ शामिल किया जाना चाहिए।

Ghazi Miyan narrative

इस्लामी हagiographic परंपरा में सैयद सालार मसूद गाजी को शहीद बताया गया है, जबकि औपनिवेशिक, गजेटियर और लोक-इतिहास स्रोतों में उनकी मृत्यु सुहेलदेव के साथ युद्ध में होना दर्ज है।

संपादकों की सहमति है कि दोनों परंपराओं को संतुलित रूप में प्रस्तुत किया जाए।

Conclusion (Editorial recommendation)

संपादकों का निष्कर्ष है कि महाराजा सुहेलदेव राजभर को एक ऐतिहासिक रूप से आधारित क्षेत्रीय शासक, जिनके व्यक्तित्व पर समय के साथ लोककथात्मक तत्व जुड़ गए, के रूप में प्रस्तुत करना Wikipedia की नीतियों (NPOV, Verifiability, Reliable Sources) के अनुरूप है।


References 

Ellis, R. R. W. (1854). Legendary Chronicles of the Buildings of Ancient India. Delhi: Delhi Gazette Press, p. 97.

Nevill, H. R. (1921). Gazetteer of the United Provinces of Agra and Oudh, Vol. XLV: Bahraich. Allahabad, p. 116.

Pandey, K. N. (1988). Uttar Pradesh District Gazetteers: Bahraich. Lucknow: Government of Uttar Pradesh, p. 17.

Führer, A. (1891). The Monumental Antiquities and Inscriptions of the North-Western Provinces and Oudh. Archaeological Survey of India.

Blunt, E. A. H. (1969). The Caste System of Northern India. London, p. 291.

Baden-Powell, B. H. (1896). Indian Village Community. London, p. 123.

Census of India (1891). Vol. XVI: North-Western Provinces and Oudh, p. 217.

Gazetteer of the Province of Oudh. Vol. III (1878), p. 52.

Nagar, A. (1968). Gadar ke Phool. p. 88.

Nagar, A. (1988). Tukde-Tukde Dastan. p. 188.

Rizvi, K. A. (n.d.). Tarikh-e-Masudi, p. 14.

Mirat-e-Masudi, p. 125.

Waseem, M. (2003). On Becoming an Indian Muslim. Oxford University Press, pp. 241–242.

Chalier-Visuvalingam, E. (1998). Bhairava: Terreur et protection. Paris, p. 180.

Tripathi, R. C. & Singh, P. (2016). Perspectives on Violence and Othering in India, p. 6.


महाराजा सुहेलदेव राजभर – FAQ


1. महाराजा सुहेलदेव राजभर कौन थे?

महाराजा सुहेलदेव राजभर 11वीं शताब्दी के उत्तर भारत, विशेषकर श्रावस्ती–बहराइच क्षेत्र के एक स्थानीय शासक थे। ऐतिहासिक गजेटियर, जनगणना रिपोर्ट और फारसी ग्रंथों के अनुसार वे भर/राजभर समुदाय के एक शक्तिशाली राजा या सरदार थे, जिन्हें विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध संघर्ष के लिए जाना जाता है।


2. महाराजा सुहेलदेव राजभर का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

लोक परंपराओं के अनुसार महाराजा सुहेलदेव का जन्म 1009 ईस्वी में बहराइच क्षेत्र में हुआ था। हालाँकि उनके जन्म से संबंधित समकालीन अभिलेख उपलब्ध नहीं हैं।


3. महाराजा सुहेलदेव राजभर की जाति क्या थी?

इस विषय पर विद्वानों में मतभेद है। विश्वसनीय ऐतिहासिक स्रोतों में उन्हें:

भर / राजभर

भर-थारू

स्थानीय राजपूत (क्षेत्रीय क्षत्रिय)

के रूप में वर्णित किया गया है।

अधिकांश गजेटियर और औपनिवेशिक स्रोत उन्हें भर/राजभर समुदाय से जोड़ते हैं।


4. क्या महाराजा सुहेलदेव राजभर ने सैयद सालार मसूद गाजी को मारा था?

हाँ, Census of India (1891), Gazetteer of Oudh (1878), Blunt (1969) तथा अन्य औपनिवेशिक स्रोतों के अनुसार 1034 ईस्वी में बहराइच के पास युद्ध में सैयद सालार मसूद गाजी की मृत्यु हुई, जब वे सुहेलदेव के विरुद्ध अभियान का नेतृत्व कर रहे थे।

हालाँकि इस घटना का विवरण इस्लामी और हिंदू स्रोतों में अलग-अलग रूप में मिलता है।


5. सैयद सालार मसूद गाजी कौन थे?

सैयद सालार मसूद गाजी को महमूद गजनवी का भांजा माना जाता है। इस्लामी परंपरा में उन्हें गाजी मियां के नाम से जाना जाता है। वे 11वीं शताब्दी में उत्तर भारत में सैन्य अभियानों से जुड़े रहे और बहराइच में मारे गए।


6. महाराजा सुहेलदेव राजभर का साम्राज्य कहाँ तक फैला था?

लोक और क्षेत्रीय इतिहास के अनुसार उनका प्रभाव:

उत्तर में नेपाल सीमा तक

दक्षिण में कौशाम्बी

पूर्व में वैशाली

पश्चिम में गढ़वाल

तक माना जाता है।

हालाँकि इस विस्तार की पुष्टि सीमित स्रोतों पर आधारित है।


7. क्या महाराजा सुहेलदेव राजभर ऐतिहासिक थे या पौराणिक?

अधिकांश इतिहासकार उन्हें अर्ध-पौराणिक (Semi-legendary) मानते हैं, क्योंकि:

समकालीन शिलालेख उपलब्ध नहीं हैं

लेकिन कई स्वतंत्र प्रशासनिक, गजेटियर और जनगणना स्रोतों में उनका उल्लेख मिलता है

इसलिए उन्हें पूरी तरह काल्पनिक नहीं माना जाता।


8. बहराइच का सुहेलदेव से क्या संबंध है?

गजेटियर और पुरातात्विक रिपोर्टों के अनुसार:

बहराइच और चरदा क्षेत्र में कई अवशेष भर समुदाय से जुड़े हैं

चरदा का टीला भर सरदार सुहेलदेव का किला माना जाता है

कुछ विद्वान “बहराइच” नाम की उत्पत्ति भी भरों से जोड़ते हैं


9. क्या महाराजा सुहेलदेव राजभर का कोई स्मारक है?

हाँ। चित्तौरा (बहराइच) में स्मारक

महाराजा सुहेलदेव स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय

विभिन्न जिलों में प्रतिमाएँ स्थापित की गई हैं


10. महाराजा सुहेलदेव के नाम पर कौन-कौन सी चीज़ें हैं?

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP)

सुहेलदेव सुपरफास्ट एक्सप्रेस (22419/22420)

डाक टिकट (2018)

स्मारक, मेडिकल कॉलेज, सड़कें और संस्थान


11. क्या महाराजा सुहेलदेव राजभर को पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाया जाता है?

हाँ। उत्तर प्रदेश कक्षा 6, हरियाणा बोर्ड कक्षा 7 की पुस्तकों में महाराजा सुहेलदेव का उल्लेख मिलता है, जहाँ उन्हें भर/राजभर राजा बताया गया है।


12. महाराजा सुहेलदेव राजभर का आज क्या महत्व है?

आज महाराजा सुहेलदेव: भर/राजभर समुदाय की ऐतिहासिक पहचान स्थानीय प्रतिरोध और स्वाभिमान के प्रतीक सामाजिक-राजनीतिक चेतना के केंद्र माने जाते हैं।


13. क्या महाराजा सुहेलदेव राजभर और राजपूत एक ही थे?

कुछ इतिहासकार उन्हें स्थानीय क्षत्रिय/राजपूत मानते हैं, जबकि अन्य उन्हें भर/राजभर बताते हैं।


14. महाराजा सुहेलदेव राजभर की मृत्यु कैसे हुई?

उनकी मृत्यु के संबंध में कोई सर्वसम्मत ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध नहीं है। अधिकतर स्रोत उनके जीवन के अंतिम वर्षों पर मौन हैं।


15. महाराजा सुहेलदेव राजभर को “राष्ट्रवीर” क्यों कहा जाता है?

क्योंकि लोक इतिहास और आधुनिक सामाजिक विमर्श में उन्हें विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध संघर्ष करने वाले स्थानीय राजा के रूप में देखा जाता है।


लेखक: Rameshwar Rajbhar स्वतंत्र इतिहास शोधकर्ता एवं राजभर समाज पर लेखन

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