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राजा सुहेलदेव राजभर और बहराइच का प्राचीन इतिहास: गजेटियर के अनुसार एक ऐतिहासिक अध्ययन

राजा सुहेलदेव राजभर
राजा सुहेलदेव राजभर (काल्पनिक चित्र)
काल 11वीं शताब्दी
क्षेत्र बहराइच – श्रावस्ती – अवध
जाति भर जाति
प्रसिद्धि विदेशी आक्रमणकारियों का प्रतिरोध
स्रोत बहराइच गजेटियर
संस्कृति हिन्दू / स्थानीय परंपरा

परिचय


बहराइच जिला उत्तर भारत के उन प्राचीन क्षेत्रों में शामिल है, जिनका इतिहास धार्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। बहराइच गजेटियर के अनुसार, मुस्लिम आक्रमणों से पहले इस क्षेत्र का इतिहास पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं है, लेकिन उपलब्ध परंपराएँ, पुरातात्विक अवशेष और विदेशी यात्रियों के विवरण इस क्षेत्र की प्राचीनता की पुष्टि करते हैं।
इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में राजा सुहेलदेव राजभर का नाम एक शक्तिशाली और प्रतिरोधी शासक के रूप में उभरता है।


बहराइच नाम की उत्पत्ति और पौराणिक परंपराएँ


परंपरागत कथाओं के अनुसार, बहराइच का नाम ब्रह्मा से जुड़ा माना जाता है। कहा जाता है कि ब्रह्मा ने इस क्षेत्र को अपना निवास स्थान चुना और अनेक ऋषियों को बुलाकर यहाँ यज्ञ और पूजा की स्थापना की। इसी कारण इस स्थान को ब्रह्मैच या ब्रह्मा की सभा कहा गया, जो कालांतर में बहराइच कहलाया।

भिंगा से लगभग बारह मील पूर्व स्थित हथिया कुंड का विशाल टीला, टूटी ईंटों और मूर्तियों के अवशेषों से ढका हुआ है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, यह स्थान महाभारत काल के महान योद्धा राजा कर्ण से जुड़े नगरों में से एक हो सकता है।


उत्तरी कोसल, अयोध्या और रामायण कालीन संबंध


बहराइच जिला प्राचीन उत्तरी कोसल (उत्तरा) और गौरा (आधुनिक गोंडा) क्षेत्रों में सम्मिलित था। यह घाघरा नदी के उत्तर में स्थित अयोध्या राज्य का हिस्सा माना जाता है।
वायु पुराण के अनुसार, इस क्षेत्र पर भगवान राम के पुत्र लव का शासन था, जिससे बहराइच का संबंध सीधे रामायण काल से जुड़ता है।


बौद्ध काल और चीनी यात्रियों के विवरण


बौद्ध काल में बहराइच निश्चित रूप से आबाद था। टांडवा और चरदा में मिले अवशेष इस तथ्य की पुष्टि करते हैं।
प्रसिद्ध पुरातत्वविद सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने परगना इकाउना के टांडवा को कश्यप बुद्ध का जन्मस्थान माना, जहाँ उनकी अस्थियाँ दफनाई गई थीं।

चीनी यात्री फा-हियान ने इस स्थान को टोवाई कहा, जबकि ह्वेन त्सांग ने भी इस क्षेत्र का भ्रमण किया। बाद में विद्वानों के बीच श्रावस्ती की वास्तविक स्थिति को लेकर मतभेद उत्पन्न हुए, जिन पर कनिंघम, वी. ए. स्मिथ, डॉ. ब्लोच और डॉ. होए जैसे इतिहासकारों ने विस्तार से चर्चा की।


श्रावस्ती विवाद और पुरातात्विक मतभेद


कुछ विद्वानों ने सहेत-महेत को श्रावस्ती का वास्तविक स्थल माना, जबकि अन्य ने नानपारा तहसील के चरदा या नेपाल तराई क्षेत्र को अधिक उपयुक्त बताया।
सहेत-महेत से प्राप्त शिलालेख वाली मूर्ति, जिस पर “श्रावस्ती” का उल्लेख है, इस विवाद का प्रमुख आधार बनी। यह विषय आज भी इतिहासकारों के बीच शोध और बहस का विषय है।


भर (भार) जाति और बहराइच का इतिहास


बहराइच गजेटियर में अनेक टीलों, कुओं और इमारतों को भार या भर जाति से जोड़ा गया है। ऐसा भी माना जाता है कि बहराइच नाम का संबंध इसी जनजाति से हो सकता है।

विशेष रूप से चरदा का टीला, गोंडा के भर सरदार राजा सुहेलदेव (सुहल देव / सुहृद्ध्वज) के किले के रूप में जाना जाता है। उन्हें एक शक्तिशाली और साहसी राजा माना गया है, जिन्होंने बाहरी आक्रमणकारियों का सामना किया।


राजा सुहेलदेव राजभर: ऐतिहासिक पहचान


इतिहास में सैयद सालार मसूद गाजी एक प्रमाणित ऐतिहासिक व्यक्ति हैं, और बहराइच के कई स्थान पारंपरिक रूप से भरों से जुड़े हुए हैं।
गजेटियर के अनुसार, भर कई शताब्दियों तक अवध के बड़े हिस्से पर प्रभावी रहे। समय के साथ अत्याचार, युद्ध और सामाजिक परिवर्तन के कारण वे राजपूत, अहीर और अन्य जातियों में समाहित होते चले गए।

राजा सुहेलदेव राजभर को लेकर विभिन्न मत मिलते हैं

  • कुछ उन्हें भर मानते हैं
  • कुछ थारू, कलहंस या बैस
  • यहाँ तक कि जैन परंपरा से भी जोड़ा गया है

यह विविधता इस बात का प्रमाण है कि वे एक व्यापक प्रभाव वाले शासक थे, जिनका शासन कई समुदायों तक फैला हुआ था।


निष्कर्ष


बहराइच गजेटियर के अनुसार, बहराइच का इतिहास केवल एक जिले का इतिहास नहीं, बल्कि उत्तर भारत की सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक विरासत का महत्वपूर्ण अध्याय है।
इस इतिहास के केंद्र में राजा सुहेलदेव राजभर जैसे शासक खड़े दिखाई देते हैं, जिन्होंने न केवल अपने क्षेत्र की रक्षा की, बल्कि स्थानीय समाज और संस्कृति को भी दिशा दी।


FAQ


Q1. राजा सुहेलदेव राजभर कौन थे?

राजा सुहेलदेव राजभर 11वीं शताब्दी के एक शक्तिशाली स्थानीय शासक थे, जिनका शासन बहराइच–श्रावस्ती क्षेत्र में माना जाता है।

Q2. बहराइच का नाम कैसे पड़ा?

परंपरागत मान्यता के अनुसार बहराइच का नाम ब्रह्मा से जुड़ा है, जिसे पहले “ब्रह्मैच” कहा जाता था।


Q3. क्या राजा सुहेलदेव भर जाति से थे?

बहराइच गजेटियर के अनुसार राजा सुहेलदेव को भर (भार) जाति से जोड़ा जाता है, हालांकि कुछ अन्य मत भी हैं।

Q4. बहराइच का बौद्ध इतिहास क्या है?

टांडवा और चरदा जैसे स्थलों से बौद्ध काल के अवशेष मिले हैं, जिनका उल्लेख चीनी यात्रियों ने भी किया है।


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